श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  12.331.63 
श्रुत्वा चर्षिस्तद् वचनं शुकस्य
प्रीतो महात्मा पुनराह चैनम्।
भो भो पुत्र स्थीयतां तावदद्य
यावच्चक्षु: प्रीणयामि त्वदर्थे॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
शुकदेवजी की यह बात सुनकर महात्मा व्यासजी बहुत प्रसन्न हुए और उनसे बोले, 'बेटा! बेटा! आज तुम यहीं ठहरो, ताकि मैं जी भरकर तुम्हें निहार सकूँ और अपनी आँखों को तृप्त कर सकूँ।'
 
On hearing this from Shukdev, Mahatma Vyasa became very pleased and said to him, 'Son! Son! Stay here today, so that I can gaze at you to my heart's content and satisfy my eyes.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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