श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  12.331.56 
रविस्तु संतापयते लोकान् रश्मिभिरुल्बणै:।
सर्वतस्तेज आदत्ते नित्यमक्षयमण्डल:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणों से सम्पूर्ण जगत को तृप्त करते हैं। वे सर्वत्र का तेज अपने में समाहित कर लेते हैं (उनका तेज कभी क्षीण नहीं होता); अतः उनका चक्र सदैव बना रहता है ॥ 56॥
 
The Sun God satisfies the entire world with his intense rays. He absorbs the radiance from everywhere (his radiance never diminishes); therefore his circle remains everlasting. ॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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