श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  12.331.53 
तस्माद् योगं समास्थाय त्यक्त्वा गृहकलेवरम्।
वायुभूत: प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाकरम्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं योग का आश्रय लेकर इस शरीर को त्यागकर वायु रूप में सूर्यमण्डल में प्रवेश करूँगा ॥53॥
 
Therefore, I will take the shelter of yoga and leave this body and will enter the solar system in the form of air. 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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