श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  12.331.52 
न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गति:।
अवबन्धो हि बुद्धस्य कर्मभिर्नोपपद्यते॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
परन्तु योग के बिना वह परम मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। बुद्धिमान पुरुष के लिए कर्म के अधम बंधन में बँधा रहना उचित नहीं है ॥ 52॥
 
But without Yoga that ultimate salvation cannot be attained. It is not proper for an intelligent person to remain bound by the inferior bondage of karma. ॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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