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mahabharat 12.331.51: अब मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ मेरी आत्मा को शांति मिलेगी और जहाँ मैं सनातन, अविनाशी और चिरस्थायी स्वरूप में रहूँगा ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.331.51 
तत्र यास्यामि यत्रात्मा शमं मेऽधिगमिष्यति।
अक्षयश्चाव्ययश्चैव यत्र स्थास्यामि शाश्वत:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
अब मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ मेरी आत्मा को शांति मिलेगी और जहाँ मैं सनातन, अविनाशी और चिरस्थायी स्वरूप में रहूँगा ॥ 51॥
 
Now I will go there, where my soul will find peace and where I will remain in the form of eternal, indestructible and everlasting. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)