श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.331.5 
स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव।
आयुरादाय मर्त्यानां रात्र्यहानि पुन: पुन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जैसे नदी आगे की ओर बहती रहती है और कभी पीछे नहीं लौटती, वैसे ही दिन और रात भी आते-जाते रहते हैं और मनुष्यों के प्राणों का हरण करते रहते हैं ॥5॥
 
Just as the river keeps flowing forward and never turns back, similarly the day and night keep coming and going, abducting the life of human beings. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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