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श्लोक 12.331.5  |
स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव।
आयुरादाय मर्त्यानां रात्र्यहानि पुन: पुन:॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे नदी आगे की ओर बहती रहती है और कभी पीछे नहीं लौटती, वैसे ही दिन और रात भी आते-जाते रहते हैं और मनुष्यों के प्राणों का हरण करते रहते हैं ॥5॥ |
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| Just as the river keeps flowing forward and never turns back, similarly the day and night keep coming and going, abducting the life of human beings. ॥ 5॥ |
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