श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.331.40 
क्लेशा: परिनिवर्तन्ते केषाञ्चिदसमीक्षिता:।
स्वं स्वं च पुनरन्येषां न किंचिदधिगम्यते॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
कितने ही लोगों के कष्ट बिना ध्यान दिए ही दूर हो जाते हैं, और कितनों को अपने ही धन से समय पर कुछ भी प्राप्त नहीं होता ॥40॥
 
The troubles of many people go away without even paying any attention to it, and others do not get anything from their own wealth on time. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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