श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.331.35 
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम्।
स्रोतसा सहसाऽऽक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सब लोग अचानक भवसागर के प्रबल प्रवाह में पड़कर मोह और शोक में डूबते हुए इधर-उधर तैर रहे हैं और पीड़ा से चिल्लाने में भी असमर्थ हैं ॥ 35॥
 
In this manner all people, having suddenly fallen into the strong current of the ocean of existence, are floating here and there, drowning in attachment and sorrow and are unable even to cry out in pain. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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