श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.331.29 
नाभ्युत्थाने मनुष्याणां योगा: स्युर्नात्र संशय:।
व्याधिभिश्च विमथ्यन्ते व्याधै: क्षुद्रमृगा इव॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जैसे शिकारी छोटे-छोटे हिरणों को सताते हैं, वैसे ही जब नाना प्रकार के रोग मनुष्यों को सताते हैं, तब उनमें उठने-बैठने की भी शक्ति नहीं रहती, इसमें संशय नहीं है ॥29॥
 
Just as hunters torment small deer, similarly when various kinds of diseases torment men, then they lose the strength even to get up or sit, there is no doubt about this. ॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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