श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.331.23 
सङ्गत्या जठरे न्यस्तं रेतोबिन्दुमचेतनम्।
केन यत्नेन जीवन्तं गर्भं त्वमिह पश्यसि॥ २३॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव! पुरुष जब स्त्री के साथ संभोग करके उसके गर्भ में अचेतन वीर्य स्थापित करता है, तो वह गर्भस्थ शिशु यहाँ किस प्रयत्न से जीवित रहता है, क्या आप कभी इस पर विचार करते हैं?॥23॥
 
Shukdev! The unconscious sperm that a man places in the womb of a woman after intercourse with her, transforms into a fetus. Then by what effort does that fetus remain alive here, do you ever think about this?॥23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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