श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.331.22 
निर्दग्धं परदेहेऽपि परदेहं चलाचलम्।
विनश्यन्तं विनाशान्ते नावि नावमिवाहितम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जैसे नाव के टूट जाने पर उस पर बैठे हुए लोगों को निकालने के लिए दूसरी नाव तैयार रखी जाती है, वैसे ही जब एक शरीर में जीवात्मा मर जाता है, तो मृत्यु के बाद दूसरा नाशवान शरीर तैयार रखा जाता है, ताकि वह अपने कर्मों का फल भोग सके ॥22॥
 
Just as when a boat breaks down, another boat is kept ready to take the people sitting on it off, similarly, when a soul dies in one body, another perishable body is kept ready after death so that it can enjoy the fruits of its actions. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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