श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.331.19 
अपरे धनधान्यानि भोगांश्च पितृसंचितान्।
विपुलानभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलै:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
और ऐसे भी बहुत हैं जो आनन्द और आनंद के समय में जन्म लेकर अपने पिता द्वारा संचित अपार धन और प्रचुर सुखों के अधिकारी हो जाते हैं॥19॥
 
And there are many who, being born in a time of merriment and pleasure, become entitled to the unlimited wealth and abundant pleasures accumulated by their father.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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