श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.331.14 
अपराधं समाचक्ष्व पुरुषस्य स्वभावत:।
शुक्रमन्यत्र सम्भूतं पुनरन्यत्र गच्छति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
स्वभावतः यह पुरुष का दोष (प्रारब्ध दोष) है। वीर्य कहीं और उत्पन्न होता है और संतानोत्पत्ति के लिए कहीं और जाता है ॥14॥
 
Naturally, this is the fault of the man (Prarabdha Dosha). The semen is produced elsewhere and goes elsewhere for procreation. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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