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mahabharat 12.330.9: जो मनुष्य पूर्वकाल में मरे हुए किसी व्यक्ति या नष्ट हुई वस्तु के लिए निरन्तर शोक करता है, वह एक दुःख से दूसरे दुःख में जाता है। इस प्रकार उसे दो विपत्तियाँ भोगनी पड़ती हैं॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.330: शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 330: शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.330.9 
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति।
दु:खेन लभते दु:खं द्वावनर्थौ प्रपद्यते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य पूर्वकाल में मरे हुए किसी व्यक्ति या नष्ट हुई वस्तु के लिए निरन्तर शोक करता है, वह एक दुःख से दूसरे दुःख में जाता है। इस प्रकार उसे दो विपत्तियाँ भोगनी पड़ती हैं॥9॥
 
A person who continuously mourns for someone who died in the past or for something that has been destroyed, goes from one sorrow to another. In this way he has to suffer two calamities.॥9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)