श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 330: शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.330.28 
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा।
चक्षु:श्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च विद्यया॥ २८॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को धैर्य से अपने लिंग और पेट की रक्षा करनी चाहिए, नेत्रों से अपने हाथ और पैरों की रक्षा करनी चाहिए, मन से अपने नेत्रों और कानों की रक्षा करनी चाहिए तथा सद्ज्ञान से वाणी की रक्षा करनी चाहिए।
 
A man must protect his penis and abdomen with patience, his hands and feet with the help of his eyes, his eyes and ears with the help of his mind and speech with the help of good knowledge.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)