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mahabharat 12.330.17: जो मनुष्य सुख-दुःख दोनों की चिन्ता त्याग देता है, वह अक्षय ब्रह्म को प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष उसके लिए शोक नहीं करते। 17॥   |   mahabharat अध्याय 12.330: शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 330: शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.330.17 
परित्यजति यो दु:खं सुखं वाप्युभयं नर:।
अभ्येति ब्रह्म सोऽत्यन्तं न तं शोचन्ति पण्डिता:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सुख-दुःख दोनों की चिन्ता त्याग देता है, वह अक्षय ब्रह्म को प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष उसके लिए शोक नहीं करते। 17॥
 
The person who gives up the worries of both happiness and sorrow attains Akshay Brahma. Learned men do not mourn for him. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)