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mahabharat 12.33.48: कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रिय धर्म का पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है; अतः अब तुम उसी धर्म की रक्षा करो, जो मृत्यु के बाद सबके लिए हितकर हो॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.33.48 
अवाप्त: क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकण्टकम्।
रक्षस्व धर्मं कौन्तेय श्रेयान् य: प्रेत्य भारत॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रिय धर्म का पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है; अतः अब तुम उसी धर्म की रक्षा करो, जो मृत्यु के बाद सबके लिए हितकर हो॥48॥
 
Kuntikumar! Bharatnandan! You have followed the Kshatriya Dharma and at this time you have got this Nishkantak kingdom; Therefore, now you protect only that religion, which is beneficial for everyone after death. 48॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीयोपाख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तीयोपाख्यानविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)