कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रिय धर्म का पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है; अतः अब तुम उसी धर्म की रक्षा करो, जो मृत्यु के बाद सबके लिए हितकर हो॥48॥
Kuntikumar! Bharatnandan! You have followed the Kshatriya Dharma and at this time you have got this Nishkantak kingdom; Therefore, now you protect only that religion, which is beneficial for everyone after death. 48॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीयोपाख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तीयोपाख्यानविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)