श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.33.47 
अशोच्यास्ते महात्मान: क्षत्रिया: क्षत्रियर्षभ।
स्वकर्मभिर्गता नाशं कृतान्तबलमोहिता:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ क्षत्रियों! जो महामनस्वी क्षत्रिय युद्ध में मारे गए हैं, वे शोक करने योग्य नहीं हैं, क्योंकि वे काल के बल से मोहित होकर अपने ही कर्मों से नष्ट हो गए हैं।
 
O great Kshatriyas! Those great-minded Kshatriyas who have been killed in the war are not worthy of mourning because they have been destroyed by their own deeds, being deluded by the power of time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)