श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.33.4 
तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान् महीक्षित:।
असकृत् सोमपान् वीरान् किं प्राप्स्यामि तपोधन॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे तपस्वी! जो अनेक बार सोमरस पी चुके हैं और सदैव धर्म में तत्पर रहते हैं, ऐसे वीर राजाओं को मारकर मुझे क्या फल मिलेगा?॥4॥
 
O ascetic! What reward would I get by killing such valiant kings who had drunk the nectar of Soma many times and were always devoted to Dharma?॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)