श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.33.39 
मरुद्भि: सह जित्वारीन् भगवान् पाकशासन:।
एकैकं क्रतुमाहृत्य शतकृत्व: शतक्रतु:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
भगवान् पक्षासन इन्द्र ने शत्रुओं को परास्त करके मरुद्गणों के साथ सौ बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिससे वे 'शतक्रु' नाम से प्रसिद्ध हुए ॥39॥
 
Lord Pakshasan Indra along with Marudganas performed the ritual of Ashwamedha Yagya a hundred times after defeating the enemies. Due to this he became famous by the name 'Shatkratu'. 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)