श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.33.38 
अश्वमेधो महायज्ञ: प्रायश्चित्तमुदाहृतम्।
तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
इसके लिए अश्वमेध नामक महायज्ञ को प्रायश्चित कहा गया है। महाराज! आप इस यज्ञ का अनुष्ठान करें। ऐसा करने से आप पापरहित हो जाएँगे। 38॥
 
For this, the great Yagya Ashwamedha is said to be the atonement. Maharaj! You perform the rituals of this Yagya. By doing this you will become sinless. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)