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अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप।
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता॥ ३२॥
अनुवाद
हे मनुष्यों! कभी धर्म भी अधर्म हो जाता है और कभी अधर्म प्रतीत होने वाला कर्म भी धर्म हो जाता है; इसलिए विद्वान पुरुष को धर्म और अधर्म के रहस्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिए।
O lord of men! At some point of time Dharma itself becomes Adharma and at other times the action which appears to be Adharma itself becomes Dharma; therefore a learned person should thoroughly understand the secret of Dharma and Adharma. 32.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥