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mahabharat 12.33.30: जो दुष्ट आत्माएँ धर्म का नाश करना चाहती हैं और अधर्म को बढ़ावा दे रही हैं, उनका वध करना उचित है। जैसे देवताओं ने अहंकारी राक्षसों का नाश किया था।   |   mahabharat अध्याय 12.33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.33.30 
धर्मव्युच्छित्तिमिच्छन्तो येऽधर्मस्य प्रवर्तका:।
हन्तव्यास्ते दुरात्मानो देवैर्दैत्या इवोल्बणा:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो दुष्ट आत्माएँ धर्म का नाश करना चाहती हैं और अधर्म को बढ़ावा दे रही हैं, उनका वध करना उचित है। जैसे देवताओं ने अहंकारी राक्षसों का नाश किया था।
 
It is appropriate to kill those evil souls who want to destroy Dharma and are promoting Adharma. Just like the Gods had destroyed the arrogant demons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)