श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.33.27 
एकार्णवां महीं कृत्वा रुधिरेण परिप्लुताम्।
जघ्नुर्दैत्यांस्तथा देवास्त्रिदिवं चाभिलेभिरे॥ २७॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने रक्त से लथपथ पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया, समस्त दैत्यों को मार डाला और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया॥27॥
 
The gods submerged the earth soaked in blood in the ocean, killed all the demons and took control of the heaven.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)