श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.33.21 
आत्मनश्च विजानीहि नियतव्रतशासनम्।
यदा त्वमीदृशं कर्म विधिनाऽऽक्रम्य कारित:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें अपने आचरण पर भी ध्यान देना चाहिए कि ‘तुम सदा उत्तम व्रतों का नियमित पालन करने में लगे रहते थे, फिर भी विधाता ने तुम्हें बलपूर्वक अपने अधीन करके ऐसा क्रूर कार्य करवाया।’ ॥21॥
 
You should also pay attention to your conduct that 'You were always engaged in following the good vows regularly, yet the Creator forcibly subjugated you and made you do such a cruel act.' ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)