श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  12.33.1-3 
युधिष्ठिर उवाच
हता: पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातर: पितरस्तथा।
श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाश्च पितामहा:॥ १॥
क्षत्रियाश्च महात्मान: सम्बन्धिसुहृदस्तथा।
वयस्या भागिनेयाश्च ज्ञातयश्च पितामह॥ २॥
बहवश्च मनुष्येन्द्रा नानादेशसमागता:।
घातिता राज्यलुब्धेन मयैकेन पितामह॥ ३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'पितामह! राज्य के लोभ में मैंने ही अनेक क्षत्रिय राजाओं को मरवा डाला, जिनमें मेरे पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, मामा, दादा, भतीजे, सम्बन्धी, शुभचिंतक, मित्र और भाई-बहन सम्मिलित थे, जो विभिन्न देशों से आये थे।
 
Yudhishthira said, 'Grandfather! In the greed for the kingdom, I alone got many Kshatriya kings killed who included my sons, grandsons, brothers, uncles, fathers-in-law, teachers, maternal uncles, grandfathers, nephews, relatives, well-wishers, friends and siblings who had come from various countries.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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