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mahabharat 12.329.8: इस मानव शरीर में जहाँ सुख नहीं है, जो सांसारिक वस्तुओं में आसक्त हो जाता है, वह मोहित हो जाता है। सांसारिक वस्तुओं का संग स्वयं दुःखरूप है, अतः वह दुःखों से मुक्ति नहीं दिला सकता ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.329.8 
मानुष्यमसुखं प्राप्य य: सज्जति स मुह्यति।
नालं स दु:खमोक्षाय संयोगो दु:खलक्षणम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इस मानव शरीर में जहाँ सुख नहीं है, जो सांसारिक वस्तुओं में आसक्त हो जाता है, वह मोहित हो जाता है। सांसारिक वस्तुओं का संग स्वयं दुःखरूप है, अतः वह दुःखों से मुक्ति नहीं दिला सकता ॥8॥
 
In this human body where there is no happiness, one who gets attached to worldly things gets deluded. Association with worldly things is itself a form of sorrow, hence it cannot relieve one from sorrows. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)