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mahabharat 12.329.58-59h: इसलिए तू कर्मों से मुक्त, सब प्रकार के बंधनों से मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, परिपूर्ण और सांसारिक भावनाओं से रहित हो जा । 58 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 58-59h
 
 
श्लोक  12.329.58-59h 
स त्वं निवृत्तबन्धस्तु निवृत्तश्चापि कर्मत:॥ ५८॥
सर्ववित् सर्वजित् सिद्धो भव भावविवर्जित:।
 
 
अनुवाद
इसलिए तू कर्मों से मुक्त, सब प्रकार के बंधनों से मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, परिपूर्ण और सांसारिक भावनाओं से रहित हो जा । 58 1/2॥
 
Therefore, become free from actions, free from all kinds of bondages, omniscient, omnipotent, perfect and devoid of worldly feelings. 58 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)