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mahabharat 12.329.53-54h: मोक्ष का उपाय जानने वाले भगवान नारायण कहते हैं कि आत्मा, आदि और अन्त से रहित, अविनाशी, अकर्ता और निराकार, इस शरीर में विद्यमान है । 53 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 53-54h
 
 
श्लोक  12.329.53-54h 
अनादिनिधनं जन्तुमात्मनि स्थितमव्ययम्॥ ५३॥
अकर्तारममूर्तं च भगवानाह तीर्थवित्।
 
 
अनुवाद
मोक्ष का उपाय जानने वाले भगवान नारायण कहते हैं कि आत्मा, आदि और अन्त से रहित, अविनाशी, अकर्ता और निराकार, इस शरीर में विद्यमान है । 53 1/2॥
 
Lord Narayana, who knows the solution to salvation, says that the soul, without beginning and end, indestructible, non-doer and formless, is present in this body. 53 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)