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mahabharat 12.329.33: जब तुम सब कुछ छोड़कर इस संसार से जाने को विवश हो, तो फिर इस दुःखमय संसार में आसक्त क्यों हो? अपने वास्तविक लक्ष्य - मोक्ष - के लिए प्रयत्न क्यों नहीं करते?॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.329.33 
यदा सर्वं परित्यज्य गन्तव्यमवशेन ते।
अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जब तुम सब कुछ छोड़कर इस संसार से जाने को विवश हो, तो फिर इस दुःखमय संसार में आसक्त क्यों हो? अपने वास्तविक लक्ष्य - मोक्ष - के लिए प्रयत्न क्यों नहीं करते?॥ 33॥
 
When you are compelled to leave this world leaving everything behind, then why are you getting attached to this miserable world? Why don't you strive for your real goal - salvation?॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)