Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.329.19: जो पुरुष आत्मा को जानता है और अपने मन को वश में करता है, उसके लिए परम कल्याण का साधन यही है कि वह किसी भी वस्तु का संग्रह न करे, संतुष्ट रहे और इच्छा तथा चंचलता का त्याग कर दे ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.329.19 
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशीस्त्वमचापलम्।
एतदाहु: परं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मन:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष आत्मा को जानता है और अपने मन को वश में करता है, उसके लिए परम कल्याण का साधन यही है कि वह किसी भी वस्तु का संग्रह न करे, संतुष्ट रहे और इच्छा तथा चंचलता का त्याग कर दे ॥19॥
 
For one who knows the Self and controls his mind, the means of ultimate welfare is that he should not collect any object, remain content and give up desire and fickleness. ॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)