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mahabharat 12.329.15-16: जो पुरुष अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा यहाँ विषयों का अनासक्तिपूर्वक अनुभव करता है, जिसका मन शान्त, विकारों से रहित और एकाग्र है, तथा जो आत्मारूप प्रतीत होने वाले शरीर और इन्द्रियों के साथ रहता है, फिर भी उनसे विरक्त रहता है, वह मुक्त हो जाता है और शीघ्र ही परम कल्याण को प्राप्त कर लेता है ॥15-16॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.329.15-16 
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान् यश्चरत्यात्मवशैरिह।
असज्जमान: शान्तात्मा निर्विकार: समाहित:॥ १५॥
आत्मभूतैरतद्भूत: सह चैव विनैव च।
स विमुक्त: परं श्रेयो नचिरेणाधितिष्ठति॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा यहाँ विषयों का अनासक्तिपूर्वक अनुभव करता है, जिसका मन शान्त, विकारों से रहित और एकाग्र है, तथा जो आत्मारूप प्रतीत होने वाले शरीर और इन्द्रियों के साथ रहता है, फिर भी उनसे विरक्त रहता है, वह मुक्त हो जाता है और शीघ्र ही परम कल्याण को प्राप्त कर लेता है ॥15-16॥
 
He who experiences objects here with detachment through the senses which are under his control, whose mind is tranquil, free from vices and concentrated, and who lives in the company of the body and senses which appear to be the Self and yet remains detached from them, is liberated and very soon attains the ultimate welfare. ॥15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)