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mahabharat 12.329.11: मनुष्य को क्रोध से तप की, भय से लक्ष्मी की, तिरस्कार से ज्ञान की और प्रमाद से स्वयं की सदैव रक्षा करनी चाहिए ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.329.11 
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात्।
विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादत:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को क्रोध से तप की, भय से लक्ष्मी की, तिरस्कार से ज्ञान की और प्रमाद से स्वयं की सदैव रक्षा करनी चाहिए ॥11॥
 
Man should always protect penance from anger, Lakshmi from fear, knowledge from contempt and himself from carelessness. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)