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mahabharat 12.327.29-30h: उस समय शुद्ध हृदय वाले अरण्यनन्दन शुकदेव आकाश में सूर्य के समान चमक रहे थे। उसी समय व्यासजी ने भी एक प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी अपने पुत्र को अपनी ओर आते हुए देखा, जो अपनी प्रभा चारों ओर फैला रहा था।   |   mahabharat अध्याय 12.327: शुकदेवजीका पिताके पास लौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको स्वाध्यायकी विधि बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 327: शुकदेवजीका पिताके पास लौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको स्वाध्यायकी विधि बताना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  12.327.29-30h 
आरणेयो विशुद्धात्मा नभसीव दिवाकर:।
अथ व्यास: परिक्षिप्तं ज्वलन्तमिव पावकम्॥ २९॥
ददृशे सुतमायान्तं दिवाकरसमप्रभम्।
 
 
अनुवाद
उस समय शुद्ध हृदय वाले अरण्यनन्दन शुकदेव आकाश में सूर्य के समान चमक रहे थे। उसी समय व्यासजी ने भी एक प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी अपने पुत्र को अपनी ओर आते हुए देखा, जो अपनी प्रभा चारों ओर फैला रहा था।
 
At that time, Araninandan Shukadev, who had a pure heart, was shining like the Sun in the sky. At the same time Vyasa also saw a blazing fire and his son who was as radiant as the Sun, coming towards him, spreading his radiance all around.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)