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mahabharat 12.326.6-7: ब्राह्मणों में श्रेष्ठ शुकदेव ने राजा जनक द्वारा की गई मंत्रोच्चारण सहित पूजा स्वीकार की। पूजा स्वीकार करने के पश्चात उन्होंने एक गौदान स्वीकार किया और राजा को प्रणाम करते हुए महाबली शुकदेव ने उनसे उनका चिर कल्याण पूछा।   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.326.6-7 
स च तां मन्त्रवत्पूजां प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि।
प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकाद् द्विजसत्तम:॥ ६॥
गां चैव समनुज्ञाय राजानमनुमान्य च।
पर्यपृच्छन्महातेजा राज्ञ: कुशलमव्ययम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों में श्रेष्ठ शुकदेव ने राजा जनक द्वारा की गई मंत्रोच्चारण सहित पूजा स्वीकार की। पूजा स्वीकार करने के पश्चात उन्होंने एक गौदान स्वीकार किया और राजा को प्रणाम करते हुए महाबली शुकदेव ने उनसे उनका चिर कल्याण पूछा।
 
The best of Brahmins, Shukadev, accepted the ritual of worship with mantras that was offered to him by King Janaka. After accepting the worship, he accepted the donation of a cow and while paying his respects to the king, the mighty Shuka asked about his everlasting well-being. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)