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mahabharat 12.326.51: हे ब्रह्मन्! इस लोक में ब्राह्मण होने का जो भी फल है और जो भी मोक्ष रूप है, वही आपकी स्थिति है। आप और क्या माँगना चाहते हैं?॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.326.51 
यत् फलं ब्राह्मणस्येह मोक्षार्थश्च यदात्मक:।
तस्मिन् वै वर्तसे ब्रह्मन् किमन्यत् परिपृच्छसि॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! इस लोक में ब्राह्मण होने का जो भी फल है और जो भी मोक्ष रूप है, वही आपकी स्थिति है। आप और क्या माँगना चाहते हैं?॥ 51॥
 
O Brahman! Whatever is the result of being a Brahmin in this world and whatever is the form of salvation, that is your position. What else do you want to ask?॥ 51॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पत्तौ षड्‍‍विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकोत्पत्तिविषयक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)