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mahabharat 12.326.50: मैं तथा अन्य बुद्धिमान पुरुष भी आपको शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील परम मार्ग (मोक्ष) पर स्थित मानते हैं। ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.326.50 
अहं त्वामनुपश्यामि ये चाप्यन्ये मनीषिण:।
आस्थितं परमं मार्गमक्षयं तमनामयम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
मैं तथा अन्य बुद्धिमान पुरुष भी आपको शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील परम मार्ग (मोक्ष) पर स्थित मानते हैं। ॥50॥
 
I and other wise men also consider you to be situated on the eternal and unchangeable ultimate path (salvation). ॥50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)