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mahabharat 12.326.5: जब व्यासपुत्र शुकदेव उस आसन पर विराजमान हुए, तो राजा जनक ने शास्त्रानुसार उनकी पूजा की। राजा ने पहले उन्हें जल और जल अर्पित करने के बाद उन्हें एक गाय भेंट की।   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.326.5 
तत्रोपविष्टं तं कार्ष्णिं शास्त्रत: प्रत्यपूजयत्।
पाद्यं निवेद्य प्रथममर्घ्यं गां च न्यवेदयत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जब व्यासपुत्र शुकदेव उस आसन पर विराजमान हुए, तो राजा जनक ने शास्त्रानुसार उनकी पूजा की। राजा ने पहले उन्हें जल और जल अर्पित करने के बाद उन्हें एक गाय भेंट की।
 
When Vyasa's son Shukadeva sat on that seat, King Janaka started worshipping him according to the scriptures. After first offering water and water to him, the king presented him with a cow.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)