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mahabharat 12.326.39: जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाता है और फिर उन्हें वापस खींच लेता है, वैसे ही संन्यासी को चाहिए कि वह मन की सहायता से अपनी इन्द्रियों को वश में रखे ॥39॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.326.39 
प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्म: संहरते पुन:।
तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाता है और फिर उन्हें वापस खींच लेता है, वैसे ही संन्यासी को चाहिए कि वह मन की सहायता से अपनी इन्द्रियों को वश में रखे ॥39॥
 
Just as a tortoise stretches its limbs and then retracts them, similarly a Sanyasi should control his senses with the help of his mind. ॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)