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mahabharat 12.326.35: जब साधक ईर्ष्या, वासना और आसक्ति के प्रलोभनों को त्याग देता है और अपने मन को आत्मा पर केंद्रित करता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.326.35 
संयोज्य मनसाऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहनीम्।
त्यक्त्वा कामं च मोहं च तदा ब्रह्मत्वमश्नुते॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जब साधक ईर्ष्या, वासना और आसक्ति के प्रलोभनों को त्याग देता है और अपने मन को आत्मा पर केंद्रित करता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
 
When a seeker gives up the temptations of jealousy, lust and attachment and focuses his mind on the Self, then he attains Brahma. 35.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)