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mahabharat 12.326.27: उसको प्राप्त करके जब ब्रह्मचर्य आश्रम में ही तत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है, तब भगवान् की इच्छा करने वाले जीवन्मुक्त विद्वान् को शेष तीन आश्रमों में जाने की क्या आवश्यकता है? अर्थात् आवश्यकता ही नहीं है॥27॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.326.27 
तमासाद्य तु मुक्तस्य दृष्टार्थस्य विपश्चित:।
त्रिष्वाश्रमेषु को न्वर्थो भवेत् परमभीप्सत:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उसको प्राप्त करके जब ब्रह्मचर्य आश्रम में ही तत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है, तब भगवान् की इच्छा करने वाले जीवन्मुक्त विद्वान् को शेष तीन आश्रमों में जाने की क्या आवश्यकता है? अर्थात् आवश्यकता ही नहीं है॥27॥
 
After attaining that, when the Tattva is realized in Brahmacharya Ashram itself, then what is the need for a Jivanmukt scholar who desires God to go to the remaining three Ashrams? That means there is no need. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)