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mahabharat 12.326.26: अनेक जन्मों तक कर्म करने के पश्चात् जब समस्त इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरण वाला मनुष्य प्रथम आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम में मोक्ष का ज्ञान प्राप्त कर सकता है ॥26॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.326.26 
भावितै: करणैश्चायं बहुसंसारयोनिषु।
आसादयति शुद्धात्मा मोक्षं वै प्रथमाश्रमे॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अनेक जन्मों तक कर्म करने के पश्चात् जब समस्त इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरण वाला मनुष्य प्रथम आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम में मोक्ष का ज्ञान प्राप्त कर सकता है ॥26॥
 
When all the senses become pure after doing work for many births, then a person with a pure conscience can attain the knowledge of salvation in the first ashram i.e. in Brahmacharya Ashram. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)