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mahabharat 12.326.25: इस प्रकार नाना प्रकार के अनुष्ठान करके तथा शुभ-अशुभ कर्मों की आसक्ति त्यागकर मनुष्य यहाँ मोक्ष प्राप्त करता है ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.326.25 
अनेन क्रमयोगेन बहुजातिषु कर्मणाम्।
हित्वा शुभाशुभं कर्म मोक्षो नामेह लभ्यते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार नाना प्रकार के अनुष्ठान करके तथा शुभ-अशुभ कर्मों की आसक्ति त्यागकर मनुष्य यहाँ मोक्ष प्राप्त करता है ॥25॥
 
In this way, by performing different types of rituals and renouncing the attachment to auspicious and inauspicious deeds, one attains salvation here. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)