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mahabharat 12.326.23: गुरु ही हैं जो हमें इस संसार सागर से पार कराते हैं और उनके द्वारा दिया गया ज्ञान नौका के समान कहा गया है। उस ज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य भव सागर को पार कर सिद्ध हो जाता है। जैसे नदी पार करने के बाद मनुष्य नाव और केवट दोनों को छोड़ देता है, वैसे ही मुक्त पुरुष गुरु और ज्ञान दोनों को छोड़ देता है।॥23॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.326.23 
गुरु: प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते।
विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
गुरु ही हैं जो हमें इस संसार सागर से पार कराते हैं और उनके द्वारा दिया गया ज्ञान नौका के समान कहा गया है। उस ज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य भव सागर को पार कर सिद्ध हो जाता है। जैसे नदी पार करने के बाद मनुष्य नाव और केवट दोनों को छोड़ देता है, वैसे ही मुक्त पुरुष गुरु और ज्ञान दोनों को छोड़ देता है।॥23॥
 
Guru is the one who helps us cross this ocean of the world and the knowledge imparted by him is said to be like a boat. By attaining that knowledge, man crosses the ocean of existence and becomes accomplished. Just as after crossing the river, a man leaves both the boat and the boatman, similarly a liberated person leaves both the Guru and the knowledge.॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)