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mahabharat 12.326.17: घर आकर उसे विवाह करना चाहिए, गृहस्थी के काम करने चाहिए और अपनी पत्नी के प्रति स्नेह रखना चाहिए। दूसरों में दोष न देखते हुए सबके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए तथा अग्नि स्थापित करने के बाद प्रतिदिन अग्निहोत्र करना चाहिए।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.326.17 
समावृत्तश्च गार्हस्थ्ये स्वदारनिरतो वसेत्।
अनसूयुर्यथान्यायमाहिताग्निस्तथैव च॥ १७॥
 
 
अनुवाद
घर आकर उसे विवाह करना चाहिए, गृहस्थी के काम करने चाहिए और अपनी पत्नी के प्रति स्नेह रखना चाहिए। दूसरों में दोष न देखते हुए सबके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए तथा अग्नि स्थापित करने के बाद प्रतिदिन अग्निहोत्र करना चाहिए।॥17॥
 
On returning home, he should marry, perform household duties and show affection towards his own wife. He should behave appropriately with everyone without looking for faults in others and after setting up the fire, he should perform Agnihotra every day.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)