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mahabharat 12.325.45: हे भरतपुत्र! इस प्रकार से, कभी भी अपनी मर्यादा से विचलित न होने वाले व्यासनन्दन शुक ने शेष दिन और पूरी रात उस राजमहल में बितायी।   |   mahabharat अध्याय 12.325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.325.45 
अनेन विधिना कार्ष्णिस्तदह: शेषमच्युत:।
तां च रात्रिं नृपकुले वर्तयामास भारत॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे भरतपुत्र! इस प्रकार से, कभी भी अपनी मर्यादा से विचलित न होने वाले व्यासनन्दन शुक ने शेष दिन और पूरी रात उस राजमहल में बितायी।
 
O son of Bharata! By this method, Vyasanandana Shuka, who never deviated from his decorum, spent the rest of the day and the whole night in that royal palace.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पत्तौ पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३२५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुककी उत्पत्तिविषयक तीन सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)