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mahabharat 12.325.38-39h: उस समय वे हँसती, गाती और नाना प्रकार के सुन्दर क्रीड़ाओं में लीन रहती थीं। मन के भावों को समझने वाली वे सुन्दर स्त्रियाँ उदार शुकदेवजी की हर प्रकार से सेवा करने लगीं।   |   mahabharat अध्याय 12.325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  12.325.38-39h 
क्रीडन्त्यश्च हसन्त्यश्च गायन्त्यश्चापिता: शुभम्॥ ३८॥
उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञा: स्त्रिय: पर्यचरंस्तथा।
 
 
अनुवाद
उस समय वे हँसती, गाती और नाना प्रकार के सुन्दर क्रीड़ाओं में लीन रहती थीं। मन के भावों को समझने वाली वे सुन्दर स्त्रियाँ उदार शुकदेवजी की हर प्रकार से सेवा करने लगीं।
 
At that time they used to laugh, sing and indulge in various kinds of beautiful sports. Those beautiful ladies who understood the feelings of the mind started serving the generous Shukdevji in every possible way. 38 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)