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mahabharat 12.325.29-30h: पिताश्री! वहाँ एक स्थान पर बैठकर परम तेजस्वी शुकदेवजी मोक्ष के विषय में विचार करने लगे। धूप हो या छाया, दोनों में उनकी दृष्टि एक-सी थी।   |   mahabharat अध्याय 12.325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  12.325.29-30h 
तत्रासीन: शुकस्तात मोक्षमेवान्वचिन्तयत्॥ २९॥
छायायामातपे चैव समदर्शी महाद्युति:।
 
 
अनुवाद
पिताश्री! वहाँ एक स्थान पर बैठकर परम तेजस्वी शुकदेवजी मोक्ष के विषय में विचार करने लगे। धूप हो या छाया, दोनों में उनकी दृष्टि एक-सी थी।
 
Father! Sitting there in one place, the very illustrious Shukdevji started thinking about salvation. Whether it was sunlight or shade, his vision was the same in both.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)