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mahabharat 12.325.28-29h: शुकदेवजी को मध्यान्ह के सूर्य के समान शान्त खड़े देखकर उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और शास्त्रानुसार विधिपूर्वक उनका पूजन करके उन्हें राजभवन की दूसरी मंजिल पर ले गए।   |   mahabharat अध्याय 12.325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  12.325.28-29h 
मध्यं गतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम्।
पूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलि:॥ २८॥
प्रावेशयत् तत: कक्ष्यां द्वितीयां राजवेश्मन:।
 
 
अनुवाद
शुकदेवजी को मध्यान्ह के सूर्य के समान शान्त खड़े देखकर उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और शास्त्रानुसार विधिपूर्वक उनका पूजन करके उन्हें राजभवन की दूसरी मंजिल पर ले गए।
 
Seeing Shukdevji standing quietly like the radiant midday Sun, he folded his hands and bowed to him and after worshipping him appropriately according to the scriptures, he took him to the second floor of the Rajbhavan.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)