Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.325.26: शुकदेवजी वहीं खड़े रहे; परंतु उनके हृदय में न तो खेद था, न क्रोध। यात्रा की थकान और सूर्य का ताप उन्हें पीड़ा नहीं दे रहा था। भूख-प्यास भी उन्हें पीड़ा नहीं दे रही थी॥ 26॥ | mahabharat अध्याय 12.325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तथैव च शुकस्तत्र निर्मन्यु: समतिष्ठत।
न चातपाध्वसंतप्त: क्षुत्पिपासाश्रमान्वित:॥ २६॥
अनुवाद
शुकदेवजी वहीं खड़े रहे; परंतु उनके हृदय में न तो खेद था, न क्रोध। यात्रा की थकान और सूर्य का ताप उन्हें पीड़ा नहीं दे रहा था। भूख-प्यास भी उन्हें पीड़ा नहीं दे रही थी॥ 26॥
Shukdevji stood there; but there was no regret or anger in his heart. The fatigue of the journey and the sun's heat did not torment him. Hunger and thirst could not torment him.॥ 26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥